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श्री बालाजी घाटा मेहंदीपुर, राजस्थान- ओपेनलाइन की ओर से

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सर्वप्रथम हम श्री बालाजी महाराज का नमन और उनकी  वन्दना करेंगे   

श्री बालाजी महाराज

राजस्थान के सवाई माधोपुर और जयपुर की  सीमा रेखा पर स्थित मेंहदीपुर कस्बे में बालाजी का एक अतिप्रसिद्ध तथा प्रख्यात मन्दिर है जिसे श्री मेंहदीपुर बालाजी मन्दिर के नाम से जाना जाता है । भूत प्रेतादि ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहां आने वालों का तांता लगा रहता है। तंत्र मंत्रादि ऊपरी शक्तियों से ग्रसित व्यक्ति भी यहां पर बिना दवा और तंत्र मंत्र के स्वस्थ होकर लौटते हैं । सम्पूर्ण भारत से आने वाले  लगभग एक हजार रोगी और उनके  स्वजन यहां नित्य ही डेरा डाले रहते हैं ।

बालाजी का मन्दिर मेंहदीपुर नामक स्थान पर दो पहाड़ियों के बीच स्थित है , इसलिए इन्हें घाटे वाले बाबा जी भी कहा जाता है । इस मन्दिर में स्थित बजरंग बली की बालरूप मूर्ति किसी कलाकार ने नहीं बनाई, बल्कि यह स्वयंभू है । यह मूर्ति पहाड़ के अखण्ड भाग के रूप में मन्दिर की पिछली दीवार का कार्य भी करती है । इस मूर्ति को प्रधान मानते हुए बाकी मन्दिर का निर्माण कराया गया है । इस मूर्ति के सीने के बाईं तरफ़ एक अत्यन्त सूक्ष्म छिद्र है, जिससे पवित्र जल की धारा निरंतर बह रही है । यह जल बालाजी के चरणों तले स्थित एक कुण्ड में एकत्रित होता रहता है, जिसे भक्त्जन चरणामृत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं । यह मूर्ति लगभग 1000 वर्ष प्राचीन है किन्तु  मन्दिर का निर्माण इसी सदी में कराया गया है । मुस्लिम शासनकाल में कुछ बादशाहों ने इस मूर्ति को नष्ट करने की कुचेष्टा की, लेकिन वे असफ़ल रहे । वे इसे जितना खुदवाते गए मूर्ति की जड़ उतनी ही गहरी होती चली गई । थक हार कर उन्हें अपना यह कुप्रयास छोड़ना पड़ा । ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1910 में बालाजी ने अपना सैकड़ों वर्ष  पुराना चोला स्वतः  ही त्याग दिया । भक्तजन इस चोले को लेकर समीपवर्ती मंडावर रेलवेस्टेशन पहुंचे, जहां से उन्हें चोले को गंगा में प्रवाहित करने जाना था । ब्रिटिश स्टेशन मास्टर ने चोले को निःशुल्क ले जाने से रोका और उसका लगेज करने लगा, लेकिन चमत्कारी चोला कभी मन भर ज्यादा हो जाता और कभी दो मन कम हो जाता । असमंजस में पड़े स्टेशन मास्टर को अंततः चोले को बिना लगेज ही जाने देना पड़ा और उसने भी बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया । इसके बाद बालाजी को नया चोला चढाया गया । यज्ञ हवन और ब्राह्मण भोज एवं धर्म ग्रन्थों का पाठ किया गया । एक बार फ़िर से नए चोले से एक नई ज्योति दीप्यमान हुई । यह ज्योति सारे विश्व का अंधकार दूर करने में सक्षम है । बालाजी महाराज के अलावा यहां श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान ( भैरव ) की मूर्तियां भी हैं । प्रेतराज सरकार जहां द्ण्डाधिकारी के पद पर आसीन हैं वहीं भैरव जी कोतवाल के पद पर । यहां आने पर ही सामान्यजन को ज्ञात होता है कि भूत प्रेतादि किस प्रकार मनुष्य  को कष्ट पहुंचाते हैं और किस तरह सहज ही उन्हें कष्ट बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है । दुखी कष्टग्रस्त व्यक्ति को मंदिर पहुंचकर तीनों देवगणों को प्रसाद चढाना पड़ता है । बालाजी को लड्डू प्रेतराज सरकार को चावल और कोतवाल कप्तान (भैरव) को उड़द का प्रसाद चढाया जाता है । इस प्रसाद में से दो लड्डू रोगी को खिलाए जाते हैं और शेष प्रसाद पशु पक्षियों को डाल दिया जाता है । ऐसा कहा जाता है कि पशु पक्षियों के रूप में देवताओं के दूत ही प्रसाद ग्रहण कर रहे होते हैं । प्रसाद हमेशा थाली या दोने में रखकर दिया जाता है । लड्डू खाते ही रोगी व्यक्ति झूमने लगता है और भूत प्रेतादि स्वयं ही उसके शरीर में आकर बड़बड़ाने लगते है । स्वतः ही वह हथकडी और बेड़ियों में जकड़ जाता है । कभी वह अपना सिर धुनता है कभी जमीन पर लोट पोट कर हाहाकार करता है । कभी बालाजी के इशारे पर पेड़  पर उल्टा लटक जाता है । कभी आग जलाकर उसमें कूद जाता है । कभी फ़ांसी या सूली पर लटक जाता है । मार से तंग आकर भूत प्रेतादि स्वतः ही बालाजी के चरणों में  आत्मसमर्पण कर देते हैं अन्यथा समाप्त कर दिये जाते हैं । बालाजी उन्हें अपना दूत बना लेते हैं । संकट टल जाने पर बालाजी की ओर से एक दूत मिलता है जोकि रोग मुक्त व्यक्ति को भावी घटनाओं के प्रति सचेत करता रहता है । बालाजी महाराज के मन्दिर में प्रातः और सायं लगभग चार चार घंटे पूजा होती है । पूजा में भजन आरतियों और चालीसों का गायन होता है । इस समय भक्तगण जहां पंक्तिबद्ध हो देवताओं को प्रसाद अर्पित करते हैं वहीं भूत प्रेत से ग्रस्त रोगी चीखते चिल्लाते उलट पलट होते अपना दण्ड भुगतते हैं ।
श्री प्रेतराज सरकार
बालाजी मंदिर में प्रेतराज सरकार दण्डाधिकारी पद पर आसीन हैं। प्रेतराज सरकार के विग्रह पर भी चोला चढ़ाया जाता है। प्रेतराज सरकार को दुष्ट आत्माओं को दण्ड देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है ।  भक्ति-भाव से उनकी आरती , चालीसा , कीर्तन , भजन आदि किए जाते हैं । बालाजी के सहायक देवता के रूप में ही प्रेतराज सरकार की आराधना की जाती है।
पृथक रूप से उनकी आराधना - उपासना कहीं नहीं की जाती , न ही उनका कहीं कोई मंदिर है। वेद , पुराण , धर्म ग्रन्थ आदि में कहीं भी प्रेतराज सरकार का उल्लेख नहीं मिलता। प्रेतराज श्रद्धा और भावना के देवता हैं।
कुछ लोग बालाजी का नाम सुनते ही चैंक पड़ते हैं। उनका मानना है कि भूत-प्रेतादि बाधाओं से ग्रस्त व्यक्ति को ही वहाँ जाना चाहिए। ऐसा सही नहीं है। कोई भी - जो बालाजी के प्रति भक्ति-भाव रखने वाला है , इन तीनों देवों की आराधना कर सकता है। अनेक भक्त तो देश-विदेश से बालाजी के दरबार में मात्र प्रसाद चढ़ाने नियमित रूप से आते हैं।
किसी ने सच ही कहा है , नास्तिक भी आस्तिक बन जाते हैं , मेंहदीपुर दरबार में ।
प्रेतराज सरकार को पके चावल का भोग लगाया जाता है , किन्तु भक्तजन प्रायः तीनों देवताओं को बूंदी के लड्डुओं का ही भोग लगाते हैं और प्रेम-श्रद्धा से चढ़ा हुआ प्रसाद बाबा सहर्ष स्वीकार भी करते हैं।
कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव
कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव भगवान शिव के अवतार हैं और उनकी ही तरह भक्तों की थोड़ी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न भी हो जाते हैं । भैरव महाराज चतुर्भुजी हैं। उनके हाथों में त्रिशूल , डमरू , खप्पर तथा प्रजापति ब्रह्मा का पाँचवाँ कटा शीश रहता है । वे कमर में बाघाम्बर नहीं , लाल वस्त्र धारण करते हैं। वे भस्म लपेटते हैं । उनकी मूर्तियों पर चमेली के सुगंध युक्त तिल के तेल में सिन्दूर घोलकर चोला चढ़ाया जाता है ।
शास्त्र और लोककथाओं में भैरव देव के अनेक रूपों का वर्णन है , जिनमें एक दर्जन रूप प्रामाणिक हैं ।  श्री बाल भैरव और श्री बटुक भैरव, भैरव देव के बाल रूप हैं। भक्तजन प्रायः भैरव देव के इन्हीं रूपों की आराधना करते हैं । भैरव देव बालाजी महाराज की सेना के कोतवाल हैं। इन्हें कोतवाल कप्तान भी कहा जाता है। बालाजी मन्दिर में आपके भजन , कीर्तन , आरती और चालीसा श्रद्धा से गाए जाते हैं । प्रसाद के रूप में आपको उड़द की दाल के वड़े और खीर का भोग लगाया जाता है। किन्तु भक्तजन बूंदी के लड्डू भी चढ़ा दिया करते हैं ।
सामान्य साधक भी बालाजी की सेवा-उपासना कर भूत-प्रेतादि उतारने में समर्थ हो जाते हैं। इस कार्य में बालाजी उसकी सहायता करते हैं। वे अपने उपासक को एक दूत देते हैं , जो नित्य प्रति उसके साथ रहता है।
कलियुग में बालाजी ही एकमात्र ऐसे देवता हैं , जो अपने भक्त को सहज ही अष्टसिद्धि , नवनिधि तदुपरान्त मोक्ष प्रदान कर सकते हैं । 
कृपया ध्यान दें:- यह वेबसाइट ओपेनलाइन कम्युनिकेशन, राजाजीपुरम, लखनऊ, उत्तर प्रदेश द्वारा श्री बालाजी के श्रद्धालु भक्तों की जानकारी तथा उनके मार्गदर्शन के ध्येय हेतु अर्पित एक पूर्णतया अव्यावसायिक वेबसाइट है , तथा श्री मेंहदीपुर बालाजी अथवा श्री सालासर बालाजी के प्रबंध संगठनों से इस वेबसाइट का कोई प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है। 
 


Mehandipur Balaji

Sri Mehandipur Balaji Temple is situated in Dausa,Rajasthan.Basically Shri Mehendipur Balaji Temple is Lord Hanuman Ji's Temple.Long ago the image of Lord Balaji and that of Pret Raja (the King of spirits) appeared from the Arawali hills. Now people suffering from malignant spirits and black magic or spell get their relief when they make an appeal for relief to Shri Bhairav ji and Shri Pret Raj Sarkar who holds his court and awards punishment to the malignant spirits, ghosts, goblins, ghouls, evil eyed witches etc.Shrine of Balaji, Court of Pret Raja, Pooja griha, Bhairav ji temple and Ram Darbar are some of the spots worth seeing here.

Religious ritualistic performances, charity, feeding the poor, homeless and incapacitated people, water supply for all and fodder for cows and stray animals are the activities of this temple.

Balaji temple at Mehandipur in Rajasthan is very Powerful place. It is believed that the deity in this temple has divine power to cure a person possessed with evil spirit.Hundreds of 'Sankatwalas', as the possessed people are refereed to in local lingo, throng to the temple everyday to offer prayers and have 'darshan'. The temple has also become a home and the last respite for the victims.The 'Mahant' of the temple, Shri Kishor Puri Ji, prescribes the treatment. It can include reading holy texts, following a strict vegetarian and simple diet, and even afflicts physical pain to one's body.

One can witness people going through various physical therapies like keeping heavy stones on their body , on arms, legs and chest , to ease their pain. There are others who inhale the smoke that fumes out of the sweet Patasa's kept on smoldering cowpats. The ones with serious case of spirit possession, who tends to get violent, are even shackled in chains within the temple premises.

This may appear a bit anachronistic at the first glance, but thousands of people are believed to have been cured in this way. Festival time (Holi, Hanuman Jayanti and Dusshera etc) are regarded as the most auspicious time to emancipate from the evil spirit

Medical science may discard such approach to the ailment as self-deceptions based on blind faith, but for the believers, the power of Balaji is something supernatural, something beyond metaphysics.  

Places of Interest

Nilkanth Mahadev Temple - A large stone Linga, was also found whose top only is visible above the ground. It originally belonged to a Shiv Temple on the summit of the hill and a temple of Nilkanth Mahadev now occupies the site. The Temple is situated on the Aravali mountain range is at the centre of Dausa district. The temple is situated at the top of a hill. The temple is said to be 100-200 years old. Rajput kings used to have security arrangements adjacent to the temple. Cannons are still seen on the temple complex. Another interesting aspect linked to faith held by the devotees is the tiny stone structures bearing the semblance of houses at the sidewalks on the way to temple. These are built by pilgrims on their way to the shrine believing that this would fulfill their wishes of having a house of their own.

Mataji Ka Mandir - Another group of finely carved sculptures dating back to12th century AD that are worshipped are built in the front wall of a modern temple (built in 1965) known as Mataji ka Mandir etc. On the way to the Bawdi is the Harshd Mata Temple. It is dedicated to a goddess. It was built by King Chand or Chandra of Nikumbha Rajputs of Chahamana Dynasty who was ruling at Abaneri or ancient Abha-Nagari (City) during 8th - 9th century A.D. Facing East, this temple is raised over double terraced platform. Originally hails the super structure of the Mahameru Style. The Sanctum is Pancharatha on plan and consists of Sandhara Garbhagriha, pillared Mandapa, crowned by a domical ceiling. Each niche of the buttress of Garbagriha has beautiful Brahmanical deities. Sculptures curved in deep relief fixed in the niches around the plinth of the upper terrace are the main attraction of this temple.

Pratap Vatika - A few kilometres away from Dausa lay Vair. This is where the historic Pratap Vatika spreads itself. The once-lively fort-palace complex is now in ruins, and this makes an ideal location for a quiet picnic. The Pratap Mahal with its rounded roofs and small pillared balconies is very much in keeping with Rajput architecture. Within the complex is a small temple - Mohanji ka Mandir - made of red sandstone. Mohan is another name for Krishna, the dark and mischievous Hindu god with a flute. The arches and pillars of the temple, badly damaged, add to the romantic ambience greatly. The Lal Mahal topped by chhatris (cenotaphs) has a beautiful kund (tank) adjoining it. There are people inhabiting a part of the mahal, so the entire complex is not desolate. If not anything else, you might bump into their cows and goats at least.

Kaila Devi Temple - Kaila Devi(Goddess) Temple is situated on the banks of the Kalisil river in Karauli district. The temple is dedicated to the tutelary diety, goddess Kaila, of the erstwhile princely rulers of the Karauli state.It is a marble structure with a large courtyard of a checkered floor.In one place are a number of red flags planted by devotees.The place is also famous for its fair held during the dark half of 'chaitra'(March-April) and lasts for a fortnight.

Getting there and Around

By Air - The nearest airport is Sanganer, Jaipur (113 kms)

By Rail - The Nearest Railway station is Bandikui (40 kms)

By Road - Mehandipur Balaji is well connected to All major cities of North India .There is very frequent service of buses on Agra Jaipur highway. The journey can be performed by car from delhi either via Alwar-Mahwa or mathura-Bharatpur-mahwa.

Accomodation

Dausa has few good hotels of quality services like the Hotel Madhuban.There are many budget hotels too. There is a Dharamshala around the temple too that provides accommodation at very nominal charges.

Things to Remember

  • The disciples and Sankawalasare advised to contact Enquiry office for information required.
  • During the festive season & Mela please maintain discipline,wait patiently and coordinate with trust authorities.
  • Please Treat Sankatwalas humbly.
  • Bath, bear fresh clothes, be in queue & chant Jai shri Balaji-2 while for Darshan.
  • Leave the children at home/dharmshala/hotel as they may urinate etc in temple area and make place untidy. Lying/playing is not allowed in temple premises.
  • The people are not allowed to enter in girbh grigh area of temple. Offerings/prasadam should be handed over to pujariji.
  • For offerings 'sawamani', 'Bhandara', 'Bhramin Bhojan', 'Hawan', 'chola to Deity' , etc please contact Trust office in temple premises.
  • Disciples are intimated that entry in inhabited state or after smoking is totally banned.
  • Ladies, insane and evil spirited person must be accompanied by a attendant.
  • Spiritual water after arti of Lord shri Balaji shall be obtained with discipline and calm.
  • Taking photograph of deities and Sankatwalas is prohibited.
  • Insane and evil spirited person are cured by blessings of lord shri balaji.The attendant must take the help of representative of trust for cure/relief of sankat. The disciples are advised not to contact Sadhus,Sanyasies and fakirs etc for this purpose.
  • No trusty/self worker is supposed to take any favour from the devotees.
  • If any person faces harassment from any employee or self worker of trust.Please lodge a complain in office of sri balaji trust.
  • Beware of Pickpockets around the temple.As far as possible carry minimum cash and jewellery .Keep your precious belongings like Mobile phones, Gold jewellery at hotel room itself while going for Darshanas.
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